नमस्कार!
आम भारतीयों को अक्सर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद से रूबरू होना पड़ता है। कई लोग इसके आलोचक हैं तो कुछ लोग समर्थक भी हैं।
क्या वाकई ब्राह्मणवाद गलत है?
क्या सचमुच ब्राह्मणवाद से समाज को आजादी चाहिए?
क्या इस व्यवस्था का कोई विकल्प उपलब्ध है?
क्या जातिप्रथा,सतीप्रथा आदि ब्राह्मणवाद की देन है?
इन सभी सवालों का जवाब है,
ब्राह्मणवाद से बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है।
तो फिर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद क्या है?
इस सृष्टि में तीन महत्वपूर्ण शक्तियां है।
1 ज्ञान बल
2 बाहु बल
3 धन बल
जब मानव समाज ज्ञान के आधार पर ज्ञानियों के द्वारा अनुशासित हो तो वह व्यवस्था ब्राह्मणवाद,समाजवाद आदि कहलाता है। जैसे राम राज्य।
जब बाहुबल के आधार पर तानाशाहों, डकैतों आदि के द्वारा अनुशासित हो तो वह साम्राज्यवाद, सामन्तवाद आदि के नाम से जाना जाता है।जैसे जर्मनी में हिटलर का शासन।
जब धनबल के आधार पर धनकुबेरों, उद्योगपतियों के द्वारा अनुशासित हो तो वह पूंजीवाद, औपनिवेशवाद आदि के नाम से जाना जाता है। जैसे कम्पनी (ईस्ट इंडिया कम्पनी) रूल।
बाहुबली और धनकुबेरों को पहचानना आसान है, बनना आसान है पर ज्ञानियों को पहचानना या ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण बनना बेहद कठिन।
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः ।।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
विस्वामित्र का राजपूत परिवार में जन्म के बावजूद ब्रह्मर्षि बनना और उनके पुत्रों का शूद्र हो जाना उदाहरण है।
आम भारतीयों को अक्सर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद से रूबरू होना पड़ता है। कई लोग इसके आलोचक हैं तो कुछ लोग समर्थक भी हैं।
क्या वाकई ब्राह्मणवाद गलत है?
क्या सचमुच ब्राह्मणवाद से समाज को आजादी चाहिए?
क्या इस व्यवस्था का कोई विकल्प उपलब्ध है?
क्या जातिप्रथा,सतीप्रथा आदि ब्राह्मणवाद की देन है?
इन सभी सवालों का जवाब है,
ब्राह्मणवाद से बेहतर विकल्प हमारे पास नहीं है।
तो फिर ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद क्या है?
इस सृष्टि में तीन महत्वपूर्ण शक्तियां है।
1 ज्ञान बल
2 बाहु बल
3 धन बल
जब मानव समाज ज्ञान के आधार पर ज्ञानियों के द्वारा अनुशासित हो तो वह व्यवस्था ब्राह्मणवाद,समाजवाद आदि कहलाता है। जैसे राम राज्य।
जब बाहुबल के आधार पर तानाशाहों, डकैतों आदि के द्वारा अनुशासित हो तो वह साम्राज्यवाद, सामन्तवाद आदि के नाम से जाना जाता है।जैसे जर्मनी में हिटलर का शासन।
जब धनबल के आधार पर धनकुबेरों, उद्योगपतियों के द्वारा अनुशासित हो तो वह पूंजीवाद, औपनिवेशवाद आदि के नाम से जाना जाता है। जैसे कम्पनी (ईस्ट इंडिया कम्पनी) रूल।
बाहुबली और धनकुबेरों को पहचानना आसान है, बनना आसान है पर ज्ञानियों को पहचानना या ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण बनना बेहद कठिन।
जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते।
वेद-पाठात् भवेत् विप्रः ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः ।।
अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
विस्वामित्र का राजपूत परिवार में जन्म के बावजूद ब्रह्मर्षि बनना और उनके पुत्रों का शूद्र हो जाना उदाहरण है।
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥
जो अन्य व्यक्तियों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरें के धन को धेले के समान, सभी लोगों को अपनी तरह ही समझे वही पंडित अर्थात ज्ञानी है।
ब्रम्हणत्व भीख या दान में नहीं मिलती , ब्राह्मण कुल में जन्म ले लेने या
चंदन टिका लगा लेने से या गेरुवा वस्त्र पहन लेने से सभी ब्राह्मण नहीं हो जाते।
कठोर तप ,साधना और अनुभव,ज्ञान और सिद्धि की प्राप्ति के पश्चात ही कोई ब्राह्मण होता है।
अगर कोई आशाराम, राम रहीम जैसे लोगों को संत महात्मा या भगवान माने तो इसमें साधू संतों की क्या गलती?
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